दलित और मुसलमान एक, तो फिर लड़ाई अलग-अलग क्यों- मोहम्मद महताब आलम

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बिहार के युवा नेता एव्म समाज के चिंतक मोहम्मद महताब आलम ने कहा देश में हो रहे दलित-मुसलमान के साथ दोहरीमापदंड एवं अन्याय के विरुद्ध दो पायदान पर हो रहे आवाज़ को एक जगह करने की कोशिश कर रहे हैं| उनसे हुए बात चित में उन्होंने ने कहा हम लोगो ने JNU से लेकर रोहित तक की लड़ाई कदम से कदम मिलाकर लड़ी और हम चाहते हैं अब दलित भाई हमारे साथ होके समाज में हो रहे दलित-मुस्लिम अन्याय के विरुद्ध एक साथ लाडे साथ ही साथ फेसबुक के जरिये उन्होंने लोगो को एक जुट होने की अपील की पढ़े क्या कहा “सिवान बिहार” के युवा नेता एवं समाज चिंतक महताब आलम ने।

आज देश मे दलित और मुस्लिम मे एक बात की समानता है| वह समानता है उपेक्षित होने की| दलित समाज जहां बहुसंख्यक हिन्दू समाज मे उपेक्षित है वह मुसलमान देश के संविधान मे उपेक्षित है| एक अकेला मुस्लिम को हर समय इस बात का डर और दर्द रहता है कि मालूम नहीं कब उसे एक आतंकवादी घोषित करके ए.टी.एस के हवाले कर दिया जाए| और दूसरी तरफ दलित समुदाय इस खौफ मे रहता है की कब समाज का कौन सा नियम उसे पशु की ज़िंदगी जीने को वेवस न कर दे|

जब मुसलमान और दलितो का दर्द एक है तकलीफ एक है फिर आंदोलन की दशा और दिशा क्यो अलग है? यह एक मंच पर आकर क्यो खड़े नहीं होते है? मेरी शिकायत समाज के इन दोनों वर्गो से है| मेरी शिकायत इन दोनों वर्ग से संबन्धित संगठनो से भी है| आम तौर पर दलित-बहुजन एकता मंच और बैनर मे दलित चिंतन के द्वारा मुस्लिम शब्द का जिक्र जरूर आता है लेकिन सिर्फ जिक्र ही आता है|

बाकी मुस्लिमो को कोई प्रतिनिधित्व देना या उनकी बात को पटल पर रखना यह नहीं दिखता| मुस्लिम मंच पर भी दलित हिंसा या तकलीफ़ों को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है| यह दुखद है| हमे तकलीफ़ों को साझा करना होगा| बात करना होगा| खामोशी को तोड़नी होगी|

युवा नेता मोहम्मद महताब आलम का शब्द समाज को दुष्टव्यवहार एवं दोहरीमापदंड से छुटकारा दिलाने का एकता का पैगाम एक मंच पर अपनी दर्द अपनी ताखिलाफो को साझा करने का पैगाम जो समाज को दबे कुचले वर्गो को उभारने के लिए एक अच्छा कदम साबित होगा|